जल संसाधन विभाग के मेगा प्रोजेक्ट में शुद्धि-पत्र, पात्रता शर्तों में बदलाव और समयसीमा को लेकर विवाद; दिलीप बिल्डकॉन के जॉइंट वेंचर को L-1 घोषित किए जाने के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरा।छत्तीसगढ़ में ₹2,524 करोड़ की सिकासार-कोडार लिंक नहर परियोजना पर विवाद, टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल।।
जल संसाधन विभाग के मेगा प्रोजेक्ट में शुद्धि-पत्र, पात्रता शर्तों में बदलाव और समयसीमा को लेकर विवाद; दिलीप बिल्डकॉन के जॉइंट वेंचर को L-1 घोषित किए जाने के बाद विपक्ष ने सरकार को घेर
रायपुर छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग की लगभग 2,524.32 करोड़ रुपये की सिकासार-कोडार लिंक नहर परियोजना अब विकास से ज्यादा अपनी टेंडर प्रक्रिया को लेकर चर्चा में है। पैरी परियोजना के अंतर्गत सिकासार जलाशय से कोडार जलाशय तक पानी पहुंचाने के उद्देश्य से प्रस्तावित इस महत्वाकांक्षी परियोजना में टेंडर की शर्तों, पात्रता नियमों में संशोधन और बोली लगाने के लिए अतिरिक्त समय नहीं दिए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।मामले में आरोप लगाए जा रहे हैं कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान जारी किए गए शुद्धि-पत्रों (Corrigendum) के जरिए पात्रता और तकनीकी शर्तों में बदलाव किए गए, जिससे प्रतिस्पर्धी कंपनियों की भागीदारी प्रभावित हो सकती थी। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और किसी वित्तीय अनियमितता का प्रमाण सामने आना अभी आवश्यक है।**क्या है 2,524 करोड़ रुपये की परियोजना?**सिकासार जलाशय से कोडार जलाशय तक लिंक नहर और पाइपलाइन के माध्यम से पानी पहुंचाने की इस परियोजना की अनुमानित लागत 2,524.32 करोड़ रुपये (GST अतिरिक्त) बताई गई है। परियोजना के तहत पाइपलाइन बिछाने, उसकी टेस्टिंग, कमीशनिंग और पांच वर्षों तक संचालन एवं रखरखाव (O&M) का कार्य शामिल है। इसके लिए 30 महीने की समयसीमा निर्धारित की गई है।परियोजना को क्षेत्र की सिंचाई व्यवस्था और किसानों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन अब इसके क्रियान्वयन से ज्यादा टेंडर प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।**शुद्धि-पत्रों के बाद बदलीं शर्तें, अतिरिक्त समय की मांग पर विवाद**उपलब्ध विवरण के अनुसार, मई 2026 में टेंडर प्रक्रिया शुरू हुई और बोली जमा करने की अंतिम तारीख 15 जून निर्धारित की गई थी। इस दौरान विभाग की ओर से कई शुद्धि-पत्र जारी किए गए। आरोप है कि प्री-बिड बैठक के बाद पात्रता और तकनीकी शर्तों में किए गए संशोधनों से टेंडर में हिस्सा लेने वाली कंपनियों की तैयारी प्रभावित हुई।बताया जा रहा है कि कुछ प्रतिस्पर्धी ठेकेदारों ने संशोधित शर्तों के अनुरूप दस्तावेज तैयार करने के लिए समयसीमा बढ़ाने की मांग की थी। लेकिन इस मांग को स्वीकार नहीं किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया।सवाल यह है कि जब हजारों करोड़ रुपये की परियोजना के टेंडर में महत्वपूर्ण संशोधन किए जा रहे थे, तो सभी संभावित बोलीदाताओं को पर्याप्त समय देने पर विचार क्यों नहीं किया गया? क्या इससे टेंडर में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई?
हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला-
टेंडर प्रक्रिया को लेकर विवाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक पहुंचा। M/s Shiv Shakti Construction Company सहित संबंधित पक्षों की ओर से प्रक्रिया को चुनौती दिए जाने की बात सामने आई।न्यायालय में विभाग और सरकार की ओर से यह पक्ष रखा गया कि शुद्धि-पत्र जारी करना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है और परियोजना के महत्व तथा जनहित को देखते हुए टेंडर प्रक्रिया को समय पर आगे बढ़ाना आवश्यक था।उपलब्ध विवरण के मुताबिक, न्यायालय ने प्रक्रियात्मक संशोधनों में सीधे तौर पर अवैधता नहीं पाई और प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हुआ। हालांकि, न्यायालय से किसी प्रक्रिया को कानूनी रूप से आगे बढ़ने की अनुमति मिलना और टेंडर के हर पहलू पर उठे सवालों का तथ्यात्मक समाधान होना दो अलग-अलग बातें हैं।
दिलीप बिल्डकॉन के जॉइंट वेंचर को मिला L-1 का दर्जा-
टेंडर की तकनीकी और वित्तीय प्रक्रिया पूरी होने के बाद जुलाई 2026 के अंतिम सप्ताह में दिलीप बिल्डकॉन (DBL) के जॉइंट वेंचर को L-1 यानी सबसे कम बोली लगाने वाला पात्र बोलीदाता घोषित किए जाने की जानकारी सामने आई।कंपनी की ओर से 28 जुलाई को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) को दी गई सूचना में भी 2,524 करोड़ रुपये से अधिक की इस परियोजना का ठेका मिलने की जानकारी दी गई।इसके बाद टेंडर प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर सवाल और तेज हो गए। विपक्ष की ओर से आरोप लगाए जा रहे हैं कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई और नियमों में बदलाव के बावजूद प्रतिस्पर्धी कंपनियों को पर्याप्त अवसर नहीं मिला।हालांकि, केवल किसी कंपनी का L-1 घोषित होना अपने आप में अनियमितता या घोटाले का प्रमाण नहीं है। असली सवाल यह है कि टेंडर की शर्तों में बदलाव किस आधार पर किए गए, उनका सभी बोलीदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ा और पूरी प्रक्रिया में समान अवसर सुनिश्चित किए गए या नहीं।
सरकार और जल संसाधन विभाग से तीन बड़े सवाल-
इस पूरे मामले में सरकार और विभाग को निम्न सवालों का स्पष्ट जवाब देना चाहिए—
1. टेंडर प्रक्रिया के दौरान पात्रता और तकनीकी शर्तों में कितने संशोधन किए गए और प्रत्येक संशोधन का आधार क्या था?
2. संशोधित शर्तों के बाद अतिरिक्त समय मांगने वाली कंपनियों की मांग क्यों स्वीकार नहीं की गई? क्या इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई?
3. क्या विभाग ने यह सुनिश्चित करने के लिए कोई स्वतंत्र समीक्षा कराई कि टेंडर प्रक्रिया में सभी कंपनियों को समान अवसर मिला और सरकारी खजाने के हितों की पूरी तरह रक्षा हुई?
विकास जरूरी, लेकिन पारदर्शिता उससे भी जरूरी-
सिकासार का पानी कोडार जलाशय तक पहुंचे, किसानों को सिंचाई का लाभ मिले और क्षेत्र का विकास हो, यह निश्चित रूप से जरूरी है। लेकिन 2,524 करोड़ रुपये जैसी बड़ी सार्वजनिक धनराशि से जुड़ी परियोजना में पारदर्शिता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।फिलहाल इस मामले में उठ रहे सवालों का जवाब सरकार और जल संसाधन विभाग को दस्तावेजों तथा तथ्यों के आधार पर देना चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ एक कंपनी को ठेका मिलने का नहीं, बल्कि जनता के टैक्स से खर्च होने वाली हजारों करोड़ रुपये की राशि के सही इस्तेमाल का है।
