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गीतिका जाखड़: अखाड़े से अंतरराष्ट्रीय मंच तक चमकी हरियाणा की दिग्गज महिला पहलवान

13 साल की उम्र में शुरू की कुश्ती, एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में जीते पदक

भारत की दिग्गज महिला पहलवान गीतिका जाखड़ ने अपनी मेहनत और शानदार प्रदर्शन के दम पर कुश्ती की दुनिया में खास पहचान बनाई। महज 13 साल की उम्र में कुश्ती शुरू करने वाली गीतिका ने एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ गेम्स और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई पदक जीते।

पहलवानी का हुनर परिवार से मिला

18 अगस्त 1985 को हरियाणा के हिसार जिले के अग्रोहा गांव में जन्मीं गीतिका को कुश्ती का माहौल परिवार से मिला। उनके दादा पहलवान थे, जबकि पिता स्पोर्ट्स अफसर रहे। यही वजह रही कि बचपन से ही खेलों के प्रति उनका रुझान बढ़ता गया।

15 साल की उम्र में बनीं भारत केसरी

गीतिका ने महज 15 वर्ष की उम्र में भारत केसरी का खिताब अपने नाम कर लिया। इसके बाद उन्होंने लगातार 9 वर्षों तक इस प्रतिष्ठित खिताब पर अपना कब्जा बनाए रखा। 2003 और 2005 की कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता, जबकि 2007 में सिल्वर पदक हासिल किया।

अर्जुन पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान

कुश्ती में शानदार उपलब्धियों के लिए गीतिका जाखड़ को 2006 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बताया जाता है। इसके अलावा उन्हें भीम पुरस्कार और 2009 में कल्पना चावला उत्कृष्टता पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

एशियन गेम्स में भी जीते पदक

गीतिका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का गौरव बढ़ाया। उन्होंने 2006 एशियन गेम्स में सिल्वर और 2014 एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीता। 2007 में नेशनल गेम्स और सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में भी उन्होंने स्वर्ण पदक हासिल किया।

वर्ल्ड पुलिस गेम्स में भी दिखाया दम

2011 में गीतिका ने नेशनल चैंपियनशिप जीतकर कम उम्र में यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहलवानों में अपनी पहचान बनाई। 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने सिल्वर मेडल जीता। कुश्ती से आगे बढ़ने के बाद भी उनका खेल से जुड़ाव कायम रहा। वर्ष 2019 में हरियाणा पुलिस में डीएसपी रहते हुए उन्होंने वर्ल्ड पुलिस गेम्स में 60 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीता।

युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा

गीतिका जाखड़ का खेल सफर इस बात की मिसाल है कि कम उम्र में शुरू किया गया सपना मेहनत, अनुशासन और निरंतर प्रयास से बड़ी उपलब्धियों में बदला जा सकता है। उन्होंने अखाड़े से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

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