नई दिल्ली। हरतालिका तीज का व्रत इस वर्ष 14 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से यह व्रत रखती हैं। वहीं कई अविवाहित युवतियां भी मनचाहे वर की प्राप्ति की इच्छा से हरतालिका तीज पर पूजा करती हैं।
कब है हरतालिका तीज?
पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 13 सितंबर सुबह 7:08 बजे शुरू होकर 14 सितंबर सुबह 7:06 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर को रखा जाएगा।
पूजा का शुभ मुहूर्त
हरतालिका तीज की पूजा के लिए सुबह 6:05 बजे से 7:06 बजे तक का समय शुभ माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:32 से 5:19 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त 11:52 बजे से दोपहर 12:41 बजे तक रहेगा।
माता पार्वती ने किया था कठिन तप
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पति के रूप में स्वीकार किया। इसी मान्यता के कारण हरतालिका तीज का व्रत विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
किन महिलाओं को निर्जला व्रत से बचना चाहिए?
गर्भवती महिलाएं: गर्भावस्था में शरीर को पर्याप्त पानी और पोषण की जरूरत होती है। ऐसे में निर्जला उपवास से स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो सकती है। इसलिए व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।
बीमार या कमजोर महिलाएं: गंभीर बीमारी, कमजोरी या नियमित दवाओं का सेवन करने वाली महिलाओं को कठोर उपवास से बचना चाहिए। जरूरत के अनुसार फलाहार या सामान्य भोजन के साथ पूजा की जा सकती है।
वृद्ध महिलाएं: उम्र बढ़ने के साथ लंबे समय तक बिना पानी के रहना कठिन हो सकता है। इसलिए बुजुर्ग महिलाओं को स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए निर्जला व्रत से बचने की सलाह दी जाती है।
अविवाहित युवतियां: धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग मत मिलते हैं। कई मान्यताओं में अविवाहित युवतियों द्वारा हरतालिका तीज का व्रत करने की परंपरा है, जबकि कुछ परंपराएं इसे सुहागिन महिलाओं से जोड़ती हैं। इसलिए अपने परिवार और परंपरा के अनुसार निर्णय लिया जा सकता है।
धार्मिक मान्यताओं में भगवान शिव को सच्ची श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होने वाला माना गया है। इसलिए स्वास्थ्य खराब होने पर शरीर को कष्ट देने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार पूजा और भगवान का स्मरण करना उचित माना जाता है।