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नेपाल बाढ़ पर बड़ा खुलासा, तबाही से पहले ग्लेशियर में दिखे थे खतरनाक बदलाव

नेपाल में ग्लेशियर टूटने के बाद आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी है। कई इलाके मलबे में तब्दील हो गए हैं और बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इस बीच इस प्राकृतिक आपदा को लेकर सामने आई एक वैज्ञानिक रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के शुरुआती आकलन के मुताबिक, बाढ़ आने से पहले ही सैटेलाइट निगरानी के जरिए ग्लेशियर में हो रहे असामान्य बदलावों को देखा गया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन संकेतों में ग्लेशियर की सतह में बदलाव, पानी के बहाव में तेजी और आसपास की चट्टानों में अस्थिरता जैसी गतिविधियां शामिल थीं।

तबाही से पहले दिखी थी ग्लेशियर में हलचल

28 अगस्त को तैयार की गई HiRISK रिपोर्ट में आपदा से पहले की सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 24 अगस्त की तस्वीरों में ग्लेशियर से निकलने वाला पानी सामान्य से अलग और ज्यादा भूरा नजर आया। इसके अलावा आसपास की चट्टानी ढलान में एक दरार भी दिखाई दी, जिसके फैलने को संभावित अस्थिरता का संकेत माना गया।

वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लेशियर के भीतर पानी की गतिविधि में तेजी भी चिंता का कारण थी। ऐसे बदलाव कई बार ग्लेशियर और उसके आसपास मौजूद भू-भाग में बढ़ते दबाव या अस्थिरता की ओर इशारा कर सकते हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मुख्य घटना इतनी तेजी से हुई कि सीमा क्षेत्र में मौजूद लोगों को पारंपरिक चेतावनी व्यवस्था के जरिए सुरक्षित निकालने के लिए पर्याप्त समय मिलना मुश्किल था।

निचले इलाकों में बचाव का मिल सकता था मौका

रिपोर्ट में एक अहम बात यह सामने आई है कि ग्लेशियर के टूटने के बाद बाढ़ के नीचे की ओर बढ़ने वाले इलाकों में लोगों को अपेक्षाकृत ज्यादा समय मिल सकता था। कुछ स्थानों पर करीब 10 मिनट या उससे अधिक की चेतावनी संभव होने का अनुमान लगाया गया है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इन क्षेत्रों में प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम मौजूद होता और स्थानीय स्तर पर उसकी जानकारी लोगों तक तेजी से पहुंचती, तो बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जा सकता था।

इसका सबसे बड़ा असर उन हाइड्रोपावर परियोजनाओं पर काम कर रहे मजदूरों की सुरक्षा पर पड़ सकता था, जो बाढ़ के संभावित रास्ते में थे।

हिमालय में एआई आधारित निगरानी की जरूरत

रिपोर्ट से जुड़े भू-वैज्ञानिक जैकब स्टीनर ने हिमालय जैसे दुर्गम क्षेत्रों में आधुनिक निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है। उनका मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सैटेलाइट डेटा की मदद से हजारों ग्लेशियरों की लगातार निगरानी की जा सकती है।

हिमालय में बड़ी संख्या में ग्लेशियर मौजूद हैं और हर ग्लेशियर की जमीन पर जाकर निगरानी करना बेहद मुश्किल है। ऐसे में सैटेलाइट इमेजिंग और एआई तकनीक संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

बार-बार हो रही घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

वैज्ञानिकों ने इस इलाके में पहले हुई प्राकृतिक घटनाओं को भी गंभीर चेतावनी बताया है। क्षेत्र में पहले भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, बर्फ और चट्टानों के खिसकने तथा भूकंप से जुड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

लगातार हो रही ऐसी घटनाओं के बीच विशेषज्ञों का कहना है कि हाइड्रोपावर परियोजनाओं और उनके आसपास रहने वाले लोगों के लिए सिर्फ निर्माण सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। आपदा से पहले चेतावनी, सुरक्षित निकासी और स्थानीय स्तर पर आपातकालीन तैयारी भी उतनी ही जरूरी है।

फिलहाल बचाव अभियान जारी है। मलबे में दबे लोगों की तलाश के लिए सुरंगों की खुदाई, ड्रिलिंग और ड्रोन की मदद ली जा रही है। कई जगहों पर अब भी लापता लोगों की तलाश की जा रही है।

नेपाल की इस त्रासदी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर प्राकृतिक आपदा के संकेत समय रहते मिल जाएं, तो क्या बेहतर तकनीक और मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है?

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