नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी उत्सव के अवसर पर भारत की वैश्विक स्थिति, देश के सामने मौजूद चुनौतियों और सामाजिक एकता को लेकर अपनी बात रखी। नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी क्षमता, नीतियों, नेतृत्व और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान मजबूत की है। उनके मुताबिक, कुछ ऐसी ताकतें भी हैं जो भारत की प्रगति से असहज हैं और देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रही हैं।
भारत की बढ़ती ताकत पर मोहन भागवत ने क्या कहा?
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में अराजकता और अस्थिरता का माहौल है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ वैश्विक ताकतें अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए दूसरे देशों में अस्थिरता पैदा करने और अपने समर्थकों को सत्ता में स्थापित करने की कोशिश करती हैं।
भागवत के अनुसार, भारत ने पिछले कुछ दशकों में अपनी क्षमता, बेहतर नीतियों, नेतृत्व और समाज के सामूहिक प्रयासों के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया है। उन्होंने कहा कि देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव और समाज का पुरुषार्थ भारत की प्रगति में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
भारत और हिंदू समाज को बांटने की कोशिश का आरोप
मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि कुछ ताकतें भारत, हिंदू समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कमजोर करने के प्रयास करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश के भीतर कुछ लोग अपने राजनीतिक और व्यक्तिगत हितों के कारण ऐसी गतिविधियों को मदद पहुंचा सकते हैं।
हालांकि, अपने संबोधन में भागवत ने जिन ताकतों और कथित साजिशों का जिक्र किया, उनके बारे में विस्तृत प्रमाण या विशिष्ट उदाहरणों का उल्लेख नहीं किया। उनके बयान को संघ की ओर से भारत की एकता और सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के संदर्भ में देखा जा सकता है।
आंदोलन का उद्देश्य समाधान होना चाहिए: भागवत
देश में विभिन्न मुद्दों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों का जिक्र करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि समाज में समस्याएं और व्यवस्था की कमियां होना स्वाभाविक है। ऐसे में आंदोलनों के जरिए अपनी बात रखना भी सामान्य है, लेकिन उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान निकालना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आंदोलन करने वाले समूहों, शासन-प्रशासन और राजनीतिक नेताओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके कार्यों से समाज में आपसी मतभेद, नफरत या विभाजन की स्थिति पैदा न हो।
संविधान और कानून की मर्यादा बनाए रखने की अपील
मोहन भागवत ने कहा कि भावनाएं कितनी भी तीव्र क्यों न हों, सार्वजनिक व्यवहार और राजनीतिक गतिविधियां संविधान तथा कानून की सीमाओं के भीतर होनी चाहिए। उन्होंने नेताओं को आगाह किया कि वोट, लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ की इच्छा सामाजिक सद्भाव पर हावी नहीं होनी चाहिए।
उनके मुताबिक, देश की एकता बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को जिम्मेदारी से व्यवहार करना जरूरी है।
समाज की भागीदारी से निकल सकता है समस्याओं का हल
संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि समाज की हर समस्या का समाधान केवल सरकार या आंदोलनों के जरिए ही संभव नहीं है। कई मामलों में लोगों की सक्रिय भागीदारी, आपसी संवाद और सामूहिक प्रयासों से भी रास्ता निकाला जा सकता है।
उन्होंने सामाजिक संगठनों और नागरिकों की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि समाज में सहयोग और संवाद का वातावरण बनाए रखना जरूरी है। उनके संबोधन का एक प्रमुख संदेश यह रहा कि राष्ट्रीय प्रगति के साथ सामाजिक एकता, संवैधानिक मर्यादा और आपसी सद्भाव भी महत्वपूर्ण हैं।