नई दिल्ली। नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे हिमालयी इलाकों में भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। जमा देने वाले पानी, कीचड़, चट्टानों और मलबे के सैलाब ने कई गांवों, सड़कों और पुलों को अपनी चपेट में ले लिया। गुरुवार को राहत एवं बचाव दल मलबे के बीच उतरकर लापता लोगों की तलाश में जुटे रहे।
स्रोत के मुताबिक, अब तक 392 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि नेपाल और तिब्बत को मिलाकर 1,468 लोग लापता बताए जा रहे हैं। हालात अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। मलबे के कारण नदी का रास्ता अवरुद्ध हो गया है, जिससे उसके पीछे पानी जमा हो रहा है। विशेषज्ञों को आशंका है कि यदि यह पानी अचानक बाहर निकला तो एक और बड़ी बाढ़ आ सकती है।
इसी बीच तिब्बत में भूकंपीय गतिविधि भी दर्ज की गई है। यह इलाका नेपाल के प्रभावित क्षेत्र के करीब बताया जा रहा है।
नेपाल में 910 लोग अब भी लापता
नेपाल पुलिस के मुताबिक, देश में अब तक 389 शव बरामद किए जा चुके हैं। नेपाल की आपदा एजेंसी के अनुसार, 910 लोग अब भी लापता हैं। इनमें कम से कम 517 विदेशी नागरिक शामिल हैं।
सीमा पार तिब्बत में चीन ने 3 लोगों की मौत की पुष्टि की है, जबकि कम से कम 558 लोग लापता बताए गए हैं। इनमें करीब 260 विदेशी नागरिक शामिल हैं। इस तरह दोनों देशों में लापता लोगों की कुल संख्या 1,468 तक पहुंच गई है।
290 भारतीयों से अब तक संपर्क नहीं
इस प्राकृतिक आपदा में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी प्रभावित हुए हैं। इनमें कई लोग कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तिब्बत गए थे। भारत के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, 84 भारतीय नागरिकों को बचा लिया गया है, लेकिन 290 भारतीयों से अभी संपर्क नहीं हो पाया है।
लापता भारतीयों की तलाश और उनकी स्थिति की जानकारी जुटाने के प्रयास जारी हैं। नेपाल के रास्ते कैलाश मानसरोवर जाने वाले ट्रेकर्स और श्रद्धालु भी इस आपदा की चपेट में आए हैं।
आखिर कैसे आई इतनी बड़ी बाढ़?
नेपाल और चीन के मुताबिक, बुधवार को हिमालय में ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूट गया। इसके बाद बर्फ, चट्टान, मिट्टी और पानी का भारी मलबा तेजी से नीचे की ओर बहा। यह सैलाब हिमालयी नदी तंत्र में जा मिला और रास्ते में आने वाले गांवों तथा अन्य ढांचों को अपने साथ बहाता चला गया।
जिस क्षेत्र में यह तबाही हुई है, वहां से काठमांडू और ल्हासा को जोड़ने वाला मार्ग भी गुजरता है। यह इलाका ट्रेकर्स और श्रद्धालुओं के बीच भी जाना-पहचाना है।
शुरुआत में आशंका जताई गई थी कि ग्लेशियर टूटने की वजह भूकंप हो सकता है। हालांकि, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के मुताबिक, जिस 4.4 तीव्रता के भूकंपीय संकेत को पहले भूकंप माना गया था, वह वास्तव में ग्लेशियर की चट्टान और बर्फ टूटने से पैदा हुई ऊर्जा थी। इसके बाद मलबे का तेज बहाव हुआ, जिसने बड़े इलाके को प्रभावित किया।
बारिश ने बढ़ाई नई चिंता
हिमालयी इलाकों में आने वाले दिनों में बारिश की संभावना ने खतरा और बढ़ा दिया है। जल विशेषज्ञों के अनुसार, यदि बारिश जारी रहती है तो पहले से जमा पानी का स्तर और बढ़ सकता है।
ऐसे में राहत और बचाव दल के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर मलबे और बाढ़ में फंसे लोगों की तलाश जारी है, वहीं दूसरी ओर नदी का रास्ता रुकने से जमा हो रहे पानी के अचानक बाहर निकलने और एक नए संभावित सैलाब का खतरा बना हुआ है।