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बस्तर दशहरा की अनूठी परंपरा: जहां आधी रात को चुरा लिया जाता है विजय रथ, राजा को करनी पड़ती है मनुहार

देशभर में जहां दशहरा रावण दहन और बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है, वहीं छत्तीसगढ़ के बस्तर में इस महापर्व का अंदाज बेहद निराला है। करीब 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा में कई ऐसी प्राचीन और अनूठी रस्में निभाई जाती हैं, जो इतिहास, लोकविश्वास और जनजातीय परंपरा का अद्भुत संगम हैं। ऐसी ही दो बेहद खास रस्में हैं ‘भीतर रैनी’ और ‘बाहर रैनी’।

आधी रात को रथ की ‘चोरी’ और कुम्हड़ाकोट में छिपना

बस्तर दशहरा के दौरान ‘भीतर रैनी’ की रस्म बेहद रोमांचक होती है। इस परंपरा के तहत आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ को रात के अंधेरे में जगदलपुर से खींचकर कुम्हड़ाकोट ले जाया जाता है, जिस पर मां दंतेश्वरी का छत्र विराजमान रहता है। इस पूरी प्रक्रिया में माड़िया समुदाय के लोग मुख्य भूमिका निभाते हैं।

  • क्या है मान्यता: लोकमान्यता के अनुसार, इस रथ चोरी के पीछे राजा और माड़िया समुदाय के बीच पुराने समय की एक नाराजगी का प्रसंग जुड़ा है। कहा जाता है कि एक बार नाराज होकर माड़िया समुदाय के लोग विजय रथ को अपने साथ ले गए थे, तब रथ को वापस लाने के लिए राजा को खुद उनके पास जाकर उनकी मनुहार करनी पड़ी थी।
  • ऐतिहासिक स्मृति: इसी प्राचीन प्रसंग की याद में आज भी रथ को रात में कुम्हड़ाकोट ले जाने की परंपरा निभाई जाती है। यह विधान केवल रथ यात्रा नहीं, बल्कि बस्तर के इतिहास और राजा-प्रजा के आपसी रिश्तों की एक जीवंत दास्तान है।

‘बाहर रैनी’: नई फसल की खीर और रथ की वापसी

‘भीतर रैनी’ के बाद ‘बाहर रैनी’ की रस्म आती है, जो सामुदायिक सौहार्द का प्रतीक है:

  • राजा का आगमन: इस दिन बस्तर के महाराजा कुम्हड़ाकोट पहुंचते हैं और परंपरा के अनुसार माड़िया समुदाय के साथ इस अनुष्ठान में शामिल होते हैं।
  • नवाखानी का विधान: यहां ‘नवाखानी’ की रस्म निभाई जाती है, जिसमें नई फसल के चावल से खीर तैयार की जाती है। सबसे पहले मां दंतेश्वरी को इसका भोग लगाया जाता है और फिर सभी लोग मिलकर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यह विधान नई फसल के प्रति आभार और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।
  • रथ की वापसी: नवाखानी के अनुष्ठान के बाद विजय रथ को वापस जगदलपुर लाया जाता है, जिसके साथ ही भीतर और बाहर रैनी की यह अनूठी परंपरा पूरी होती है।

बस्तर दशहरा: एक जीवित सांस्कृतिक विरासत

बस्तर में दशहरा सिर्फ एक उत्सव भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी जीवित विरासत है जिसे पीढ़ियों से आदिवासी समाज और राजपरिवार ने पूरी श्रद्धा के साथ संजोए रखा है। चाहे वह रथ खींचने की अनोखी परंपरा हो, 150 साल पुराने ‘मुरिया दरबार’ में राजा और प्रजा का सीधा संवाद हो, या फिर मां दंतेश्वरी की आराधना—बस्तर का दशहरा हर मायने में देश भर में अनूठा और विशिष्ट है।

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