तिमाही पत्रिका

छत्तीसगढ़-छत्तीसगढ़ी-छत्तीसगढ़िया

हमर चिन्हारी -भक्ति -राम कथा: विभीषण को आदेश, हनुमान जी को वरदान

विदाई के समय श्रीराम ने विभीषण से कहा—“राक्षसराज! तुम धर्मपूर्वक लंका पर शासन करना। अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करना। मुझे विश्वास है कि तुम कभी धर्म के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करोगे।”इसी दौरान हनुमान जी ने प्रभु से वर माँगा—“प्रभो! मेरे मन में आपकी अटूट भक्ति सदा बनी रहे। और जब तक पृथ्वी पर रामकथा प्रचलित रहे, तब तक मेरे प्राण इसी शरीर में बसे रहें।”हनुमान जी की बात सुनकर श्रीराम अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने हनुमान जी को हृदय से लगाकर कहा—“ऐसा ही होगा। जब तक संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारे प्राण भी तुम्हारे शरीर में बने रहेंगे।”

सभी वानर वीर प्रभु श्रीराम का गुणगान करते हुए अयोध्या से विदा हुए। उनके जाने के बाद भरत जी ने श्रीराम से कहा कि राज्याभिषेक के एक महीने के भीतर ही अयोध्या में अद्भुत परिवर्तन दिखाई दे रहा है—लोग स्वस्थ हैं, वृद्धों के पास मृत्यु भी आने से हिचकती है, वर्षा समय पर होती है और वायु का स्पर्श भी सुखद प्रतीत होता है।भरत जी की बातें सुनकर प्रभु श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और रामराज्य की मंगलमयी छवि और अधिक उजागर हुई।

अयोध्या में श्रीरामचन्द्र जी के राज्याभिषेक के बाद अब वे प्रतिदिन नियमपूर्वक राजसभा में विराजमान होकर धर्मपूर्वक शासन संचालन करने लगे। उनके राज में प्रजा सुखी, सुरक्षित और संतुष्ट रहने लगी।कुछ दिन पश्चात् मिथिला नरेश राजा जनक श्रीराम से अनुमति लेकर अयोध्या से विदा हुए और मिथिला के लिए प्रस्थान किया। इसके बाद कैकेय नरेश युधाजित, काशिराज प्रतर्दन सहित अन्य आगत राजा-महाराजा भी विनयपूर्वक श्रीराम को प्रणाम कर अयोध्या से विदा हुए।इसके पश्चात् श्रीराम ने अपने प्रिय वानर वीरों—सुग्रीव, हनुमान, अंगद, नील, नल, जाम्बवन्त सहित अनेक वानर यूथपतियों को वस्त्र, आभूषण और रत्न देकर सम्मानित किया। प्रभु श्रीराम ने सभी की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हें स्नेहपूर्वक विदा किया।

🌼🌻 श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌼

0
Show Comments (0) Hide Comments (0)
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Recent Posts:
Share
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x